छत्तीसगढ़

साइबर ठगी और म्यूल बैंक खातों से 1.60 करोड़ तक लेनदेन में 7 आरोपी दोषी, एक बरी

Shantanu Roy
28 Jun 2026 10:20 PM IST
साइबर ठगी और म्यूल बैंक खातों से 1.60 करोड़ तक लेनदेन में 7 आरोपी दोषी, एक बरी
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Mahasamund. महासमुंद। महासमुंद की अदालत ने साइबर अपराध और म्यूल बैंक खातों के जरिए करोड़ों रुपये की अवैध हेराफेरी करने वाले गिरोह के मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। द्वितीय अपर सत्र न्यायाधीश आनंद बोरकर की अदालत ने सात आरोपियों को दोषी ठहराते हुए तीन-तीन वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है, जबकि एक आरोपी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। यह मामला गृह मंत्रालय के समन्वय पोर्टल से मिली सूचना के बाद सामने आया था। पोर्टल के जरिए महासमुंद पुलिस को
साइबर ठगी
में उपयोग किए जा रहे संदिग्ध बैंक खातों की जानकारी मिली थी। इसी आधार पर थाना महासमुंद में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की गई थी। तत्कालीन थाना प्रभारी निरीक्षक शरद दुबे की जांच में पता चला कि आरोपियों ने विभिन्न बैंकों जैसे केनरा बैंक, बैंक ऑफ बड़ौदा, कोटक महिंद्रा बैंक, पंजाब नेशनल बैंक और आईडीबीआई बैंक में अपने नाम से चालू और बचत खाते खुलवाए थे। इन खातों का इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त धनराशि के लेन-देन के लिए किया जा रहा था। जांच और सुनवाई के दौरान बैंक स्टेटमेंट और बैंक अधिकारियों की गवाही के आधार पर यह साबित हुआ कि इन खातों में भारी मात्रा में संदिग्ध लेन-देन हुआ है।


अदालत में पेश दस्तावेजों के अनुसार खातों में 95 लाख रुपये, 24 लाख रुपये से लेकर 1.60 करोड़ रुपये तक के ट्रांजेक्शन दर्ज किए गए थे। आरोपियों ने इन लेन-देन को लेकर कोई वैध स्पष्टीकरण नहीं दिया। न्यायालय ने रविंदर सिंह चॉवला, महेश जैस उर्फ महेश साहू, राज चन्द्राकर, शीतल कुमार साहू, रामनारायण साहू, प्रीतम उर्फ प्रेम मारकण्डे और नौशाद साहू को भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 317(2) और 61(2) के तहत दोषी माना। सभी सात दोषियों को धारा 317(2) के तहत तीन-तीन वर्ष के
सश्रम कारावास
और 100-100 रुपये अर्थदंड की सजा दी गई। वहीं धारा 61(2) के तहत एक-एक वर्ष का अतिरिक्त सश्रम कारावास और 100-100 रुपये का जुर्माना लगाया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सभी सजाएं साथ-साथ चलेंगी। जुर्माना न भरने पर एक माह का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। मामले में आरोपी दीपक तिलवानी के खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर अदालत ने उसे संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से बरी कर दिया। हालांकि पुलिस ने उसे प्रारंभिक जांच में गिरोह से जुड़ा माना था। यह फैसला साइबर अपराध और फर्जी बैंक खातों के माध्यम से हो रही वित्तीय धोखाधड़ी के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कार्रवाई माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि डिजिटल ठगी में शामिल लोगों को सख्त सजा दी जाएगी।
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